नेशनल दर्पण : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर देश में विवाद जारी है. विवाद इस कदर बढ़ चुका है कि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने इस्तीफा भी दे दिया है. कई लोगों का कहना है कि यह नियम भेदभाव बढ़ाने वाले हैं, जबकि कुछ इसे समानता की दिशा में जरूरी कदम मान रहे हैं।
मामले की गंभारता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ लोगों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है. ऐसे में सवाल उठता है कि यूजीसी का नया नियम आखिर है क्या और इसे लाने की जरूरत क्यों पड़ी।

दरअसल, रोहित वेमुला केस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए नियम-कानून बनाने को कहा. इसके बाद यूजीसी ने नए नियम बनाने शुरू किए. इस महीने यूजीसी ने ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026’ (UGC Promotion of Equity Regulations, 2026) जारी किए हैं. इन नियमों का मकसद विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों, पढ़ाने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच किसी भी तरह के भेदभाव को रोकना है. यह नियम यह सुनिश्चित करना चाहता है कि किसी के साथ उसकी जाति, लिंग, दिव्यांगता या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर गलत व्यवहार न हो।

SC-ST के साथ अब OBC और महिला को भी सुरक्षा, 

पहले बनाए गए ड्राफ्ट नियमों में केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) को जातिगत भेदभाव से सुरक्षा दी गई थी. लेकिन नए नियमों में अब अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और महिलाओं को भी इस दायरे में शामिल कर लिया गया है. इस बदलाव के बाद यह माना जाएगा कि यदि किसी OBC छात्र या कर्मचारी के साथ भी अनुचित व्यवहार होता है, तो वह भी भेदभाव की श्रेणी में आएगा. यही बदलाव इस पूरे विवाद की बड़ी वजह बना हुआ है।

हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में बनेगी इक्विटी कमेटी, 

नए नियमों के अनुसार, हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक ‘इक्विटी कमेटी’ बनाना अनिवार्य होगा. यह कमेटी भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी. इस कमेटी की अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख यानी कुलपति या प्राचार्य करेंगे. नियमों में यह भी कहा गया है कि इस कमेटी में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाएं और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधि जरूर होने चाहिए।

 

सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद, 

यहीं से विवाद शुरू होता है. नए नियमों में यह तो तय किया गया है कि SC, ST, OBC, महिलाएं और दिव्यांग वर्ग का प्रतिनिधित्व होगा, लेकिन सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं रखा गया है. विरोध करने वालों का कहना है कि जब कमेटी में सामान्य वर्ग का कोई सदस्य नहीं होगा, तो जांच निष्पक्ष कैसे हो पाएगी. उनका मानना है कि इससे एकतरफा फैसले लिए जा सकते हैं।

इन नियमों का विरोध करने वालों का कहना है कि इक्विटी कमेटी में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधि को शामिल न करना गलत है. इससे जांच प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण हो सकती है. इसके अलावा यह चिंता भी जताई जा रही है कि नियमों का गलत इस्तेमाल हो सकता है. आलोचकों का कहना है कि झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ सजा का स्पष्ट प्रावधान न होने से बेबुनियाद आरोपों की संख्या बढ़ सकती है।

– यूजीसी के नए नियमों में समानता की बात, फिर क्यों इसे बताया जा रहा है सवर्णों के खिलाफ, 

इस विवाद के बाद ये जानने की और जरूरत है कि UGC के नए नियम में आखिर क्या है, 

प्रश्न 1 : किस उद्देश्य से लाया गया है नया नियम-

उत्तर: इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों (विश्वविद्यालय, कॉलेज, डीम्ड यूनिवर्सिटी) में किसी भी छात्र, शिक्षक, कर्मचारी या प्रबंधन से जुड़े व्यक्ति के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर कोई भेदभाव न हो. खासतौर पर यह नियम अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और दिव्यांगजन जैसे समूहों के लिए समान अवसर और सम्मानजनक वातावरण बनाने पर केंद्रित है. इसका लक्ष्य केवल ‘भेदभाव रोकना’ नहीं है, बल्कि समता (Equity) और समावेशन (Inclusion) को संस्थान की संस्कृति में लाना है, ताकि पढ़ाई, मूल्यांकन, हॉस्टल, प्रवेश, मेंटरिंग, संसाधनों की उपलब्धता हर स्तर पर निष्पक्षता बनी रहे।

प्रश्न 2 : इस नियम में भेदभाव का क्या अर्थ बताया गया है,

उत्तर: नए नियम के अनुसार ‘भेदभाव’ का मतलब है, किसी भी हितधारक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान, दिव्यांगता या इनमें से किसी एक आधार पर अनुचित, पक्षपातपूर्ण, अपमानजनक या असमान व्यवहार करना. यह भेदभाव सामने भी हो सकता है और छुपकर भी किया जा सकता है. भेदभाव में केवल गाली-गलौज या खुले अपमान की बात नहीं आती, बल्कि ऐसा कोई भी व्यवहार शामिल है जो शिक्षा में समान अवसर को कमजोर करे. जैसे-

किसी छात्र को उसकी जाति/धर्म के कारण समूह से अलग करना
शिक्षा के दौरान किसी भी संसाधनों और मौकों से वंचित करना
जाति/धर्म के आधार पर बार-बार मानसिक रूप से नीचा दिखाना
ऐसी शर्तें या वातावरण बनाना जो उसकी मानवीय गरिमा के खिलाफ हों
प्रश्न 3 : जाति-आधारित भेदभाव किसे कहा गया है।

उत्तर: जाति-आधारित भेदभाव का मलतब है, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के साथ केवल उनकी जाति या जनजाति पहचान के कारण भेदभाव करना. यह भेदभाव कई रूपों में सामने आ सकता है. उदाहरण के तौर पर कक्षा में अपमानजनक टिप्पणियां करना, मित्र/समूह/हॉस्टल/मेंटोरिंग में अलग व्यवहार. मूल्यांकन या अवसरों में किसी भी तरह का पक्षपात, किसी शिकायत या समस्या को गंभीरता से न लेना. नए नियम का उद्देश्य ऐसे सभी व्यवहारों पर रोक लगाने के साथ संस्थान को जिम्मेदार बनाना है, जिससे वह ऐसी घटनाओं को ‘नजरअंदाज’ न कर सकें।

प्रश्न 4 : नए नियम में ‘समता’ का अर्थ क्या है,

उत्तर: नए नियम के अनुसार ‘समता’ का अर्थ है, सभी को उनके अधिकारों के प्रयोग में पात्रता और अवसर के मामले में समान अवसर का क्षेत्र उपलब्ध कराना. यह समझना जरूरी है कि समता का उद्देश्य केवल ‘सबको एक जैसा’ देना नहीं, बल्कि यह देखना है कि जिन समूहों को ऐतिहासिक/सामाजिक कारणों से नुकसान रहा है, उन्हें संस्थान ऐसा वातावरण दे जिसमें वे भी बिना डर और बिना बाधा के अपनी शिक्षा और विकास कर सकें।

प्रश्न 5 : उच्च शिक्षा संस्थानों पर क्या कर्तव्य डाले गए हैं,

उत्तर: नए नियम के अनुसार प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान का कर्तव्य है कि वह किसी भी रूप में किसी भी छात्र या स्टाफ भेदभाव होने न दे. सभी के बीच निष्पक्षता, समान अवसर और समावेशन को बढ़ाए. संस्थान पहले से ऐसी व्यवस्थाएं बनाए जो भेदभाव को रोकें और अगर घटना हो तो तुरंत समाधान दे. साथ ही यह स्पष्ट कहा गया है कि कोई भी संस्थान भेदभाव को ‘अनुमति’ नहीं देगा और ‘नज़रअंदाज’ भी नहीं करेगा. यह एक सख्त संस्थागत जिम्मेदारी है।

प्रश्न 6 : इन नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है,

उत्तर : संस्थान प्रमुख (कुलपति/प्राचार्य/निदेशक) का यह कर्तव्य होगा कि नियमों का विधिवत पालन हो. इसके लिए उनके पास आवश्यक शक्तियां होंगी. मतलब, यदि कहीं भेदभाव होता है, शिकायतें दबाई जाती हैं या समिति/हेल्पलाइन काम नहीं करती तो जवाबदेही संस्थान प्रमुख की भी बनती है. यह नियम ‘केवल कागज़ी’ न रह जाए, इसलिए नेतृत्व स्तर पर जिम्मेदारी तय की गई है।

प्रश्न 7 : समान अवसर केंद्र क्या है और क्यों जरूरी है,

उत्तर: हर उच्च शिक्षा संस्थान को एक समान अवसर केंद्र स्थापित करना होगा. इसका उद्देश्य यह है कि वंचित और कमजोर वर्गों के लिए जो नीतियां और कार्यक्रम बने हैं, उनका सही ढंग से क्रियान्वयन हो. यह केंद्र अकेडमिक गाइडेंस देगा. वित्तीय और सामाजिक परामर्श करेगा.
कैंपस में सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देगा।

प्रश्न 8 : समान अवसर केंद्र किन संस्थाओं/एजेंसियों से कॉर्डिनेशन करेगा,

उत्तर: केंद्र केवल आंतरिक काम नहीं करेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर, पुलिस, नागरिक समाज, स्थानीय मीडिया, जिला प्रशासन, NGO,शिक्षक, कर्मचारी, अभिभावक के साथ समन्वय स्थापित करेगा, ताकि भेदभाव रोकने और सहायता देने का नेटवर्क मजबूत हो. इसके अलावा, केंद्र जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के साथ भी समन्वय करेगा ताकि योग्य मामलों में कानूनी सहायता मिल सके।

प्रश्न 9 : समता समिति क्या है और इसमें कौन-कौन होंगे,

उत्तर: समता समिति समान अवसर केंद्र के अंतर्गत बनेगी और इसका मुख्य काम होगा, केंद्र के कामकाज का प्रबंधन और भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच करना. इस समिति में ये खास लोग होंगे।

संस्थान प्रमुख: पदेन अध्यक्ष
3 प्रोफेसर/वरिष्ठ संकाय: सदस्य
1 गैर-शिक्षण कर्मचारी: सदस्य
2 नागरिक समाज प्रतिनिधि (व्यावसायिक अनुभव वाले): सदस्य
2 छात्र प्रतिनिधि: विशेष आमंत्रित
समान अवसर केंद्र का समन्वयक: सदस्य सचिव
साथ ही समिति में OBC, दिव्यांगजन, SC, ST और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए, ताकि समिति संतुलित रहे.
प्रश्न 10 : समिति की बैठकें, कोरम और समीक्षा कैसे होगी,

उत्तर: समिति की साल में कम से कम दो बैठकें होंगी. इन बैठकों में पिछले 6 महीनों में आए मामलों पर कार्रवाई की समीक्षा की जाएगी. कोरम कम से कम 4 होगी, जिसमें अध्यक्ष शामिल होंगे, पर विशेष आमंत्रित (छात्र प्रतिनिधि) को कोरम में नहीं गिना जाएगा. यह समीक्षा इसलिए जरूरी है ताकि शिकायतें लंबित न रहें और सिस्टम लगातार सक्रिय बना रहे।

प्रश्न 11 : समान अवसर केंद्र का मुख्य काम क्या होंगा,

उत्तर: समान अवसर केंद्र का मुख्य काम कैंपस में समता और समान अवसर सुनिश्चित करना होगा।

छात्रों/कर्मचारियों में एक समान भागीदारी करना
अलग-अलग पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए अनुकूल माहौल बनाना
वंचित वर्गों की सहायता करना
शिकायतकर्ता को किसी नुकसान से बचाना
सरकारी/यूजीसी योजनाओं और सूचनाओं का प्रसार
भेदभाव माने जाने वाले कार्यों की सूची तैयार करना
वंचित वर्गों के प्रवेश के लिए समावेशी प्रक्रियाएं बनाना
वित्तीय/शैक्षणिक संसाधन जुटाने के लिए कॉर्डिनेशन
ऑनलाइन पोर्टल बनाए रखना, जिसमें हर जानकारी हो
प्रश्न 12 : समता समूह और समता दूत क्या हैं,

उत्तर: संस्थान को निगरानी और रोकथाम के लिए ‘समता समूह’ बनाना होगा, जो कैंपस के संवेदनशील स्थानों पर निरीक्षण करेगा और समय-समय पर रिपोर्ट देगा. साथ ही हर विभाग/हॉस्टल/पुस्तकालय/इकाई में कम से कम एक व्यक्ति को ‘समता दूत’ बनाया जाएगा जो समता का प्रतीक होगा. वह किसी भी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में नोडल अधिकारी रहेगा और किसी उल्लंघन की सूचना तुरंत देगा।

प्रश्न 13 : समता हेल्पलाइन कैसे काम करेगी,

उत्तर: हर संस्थान 24×7 समता हेल्पलाइन चलाएगा. यदि किसी कॉलेज की हेल्पलाइन काम न करे, तो संबद्ध विश्वविद्यालय की हेल्पलाइन उपलब्ध होगी. यह हेल्पलाइन उन लोगों के लिए है जो भेदभाव के कारण संकट में हैं. शिकायतकर्ता की पहचान अनुरोध पर गोपनीय रखी जाएगी, जिससे लोग डर के बिना शिकायत कर सकें।

प्रश्न 14 : भेदभाव की शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया क्या है?

उत्तर: पीड़ित व्यक्ति शिकायत कर सकता है।

ऑनलाइन पोर्टल पर
लिखित रूप में
समन्वयक को ईमेल द्वारा
हेल्पलाइन पर
यदि हेल्पलाइन शिकायत में प्रथम दृष्टया दंडनीय अपराध बनता है तो पुलिस को मामला भेजा जाएगा. समता समिति 24 घंटे में बैठक करेगी और 15 दिन में रिपोर्ट देगी. इसके बाद संस्थान प्रमुख 7 दिन में कार्रवाई शुरू करेगा. यदि शिकायत संस्थान प्रमुख के खिलाफ है, तो बैठक की अध्यक्षता समन्वयक करेगा और रिपोर्ट उच्चतर प्राधिकारी को भेजी जाएगी।

प्रश्न 15 : अपील कहां और कब की जा सकती है, 

उत्तर: समता समिति की रिपोर्ट से असंतुष्ट व्यक्ति 30 दिन के भीतर लोकपाल के पास अपील कर सकता है. लोकपाल आवश्यकता होने पर न्याय-मित्र नियुक्त कर सकता है, जिसका शुल्क संस्थान देगा. लोकपाल 30 दिनों में अपील निपटाने का प्रयास करेगा।

प्रश्न 16 : निगरानी और वार्षिक रिपोर्टिंग में क्या होगा, 

उत्तर: यूजीसी निगरानी तंत्र बनाएगा, संस्थानों से सूचना मांगेगा और कैंपस विजिट भी कर सकता है. हर संस्थान को अपने समान अवसर केंद्र की पूरी जानकारी जनवरी के अंत तक यूजीसी और संबंधित निकायों को देना होगा. साथ ही समान अवसर केंद्र हर साल जनवरी और जुलाई के अंत तक अर्ध-वार्षिक रिपोर्ट वेबसाइट पर देगा, जिसमें जनसांख्यिकी, ड्रॉपआउट, शिकायतें और उनकी स्थिति शामिल होगी।

प्रश्न 17 : नियमों का पालन न करने पर क्या सजा का प्रावधान है, 

उत्तर: यदि संस्थान नियमों का पालन नहीं करता और जांच में यह सिद्ध हो जाता है, तो यूजीसी, संस्था को यूजीसी योजनाओं में भागीदारी से वंचित कर सकता है. इसके साथ डिग्री कार्यक्रम चलाने से रोक सकता है. ऑनलाइन कार्यक्रम बंद कर सकता है. यूजीसी की सूची से संस्थान को हटाने तक की कार्रवाई कर सकता है. इसके अलावा केस की प्रकृति के अनुसार अन्य दंडात्मक कदम भी लिए जा सकते हैं।

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